
मैं
रात भर
अन्धेरों को सहेजता रहा
मैं गमों की बस्ती से
खुशियों के नाम
खत भेजता रहा
पर कोई
जवाब नहीं आया
बरस बीतते गए
आंखें
तरस गईं
पर
आंसुओं में तैरकर
कोई ख्वाब नहीं आया।
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तेरा सलोना बदन-है --कि है ये राग यमन -गज़लhttp://gazalkbahane.blogspot.com/
मैं गमों की बस्ती से
ReplyDeleteखुशियों के नाम
खत भेजता रहा
पर कोई
जवाब नहीं आया
Kyaa baat hai, sundar !
bahut hi achhi rachna...
ReplyDeleteआंसुओं में तैरकर
ReplyDeleteकोई ख्वाब नहीं आया।
LAJWAAB RACHNA
सुन्दर रचना...
ReplyDeleteमैं
ReplyDeleteरात भर
अन्धेरों को सहेजता रहा
मैं गमों की बस्ती से
खुशियों के नाम
खत भेजता रहा
in panktiyon ne man moh liya....
bahut hi sunder aur behtareen rachna...
bahut achchha likhte hain aap
ReplyDeleteडॉ. श्याम जी,
ReplyDeleteबहुत ही अच्छा प्रयोग है :-
आंसुओं में तैरकर
कोई ख्वाब नही आया
एक शानदार कविता के लिये बधाईयाँ।
सादर,
मुकेश कुमार तिवारी