नारी
नारी
सिकुड़ती है, सिमटती है
पुरुष को
रास्ता देने की खातिर
नारी
फैल जाती है
पुरुष के अघ औगुण
ढांपने की
कोशिश में
९
बदलता रूप
मैंने
उम्रभर देखा है

यूँ उसके रूप
बदलते रहे हैं
मौसम की तरह
पहले वह मेरी माँ थी
फिर बहन
फिर पत्नी
फिर बेटी
बेटी फिर माँ बन गई थी
क्योंकि
वह मुझ सा बेटा (नाती) जन गई थी।
"चुप भी तो रह पाना मुश्किल-gazal-":यहां देखें
http://gazalkbahane.blogspot.com/
बहुत बड़ी बात! वाह!
ReplyDeleteमैं क्या कहूँ अब? आपने तो निःशब्द कर दिया..... बहुत गहरी व सुंदर रचना...
ReplyDeleteadwitiya hai ye sach aur apke kam sabdo me dher si baate sametane ki ye kala.
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