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Thursday, October 29, 2009

सूरज का गबन


दिल के
अंधेरे मिटाने
के लिये
हमने क्या-क्या
नहीं किया
रोशनियों के जलवे चुराये
सूरज का गबन किया
पर
पूनमी रात भी
उजला सकी
मेरी खिड़कियां
तभी एक पतंगा
जल मरा
सामने की झोपड़ी
के टिमटिमाते दीये की लौ पर
और
सारा जहां
रोशन हो गया




आज यहां http://gazalkbahane.blogspot.com/ यह गज़ल पढ़ें

पहले देंगे जख्म और फिर--- गज़ल

8 comments:

  1. उम्दा भाव भरी कविता !

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  2. bahut hee gahare bhaw .........jo kuchh to kah raha hai jo sirf jalane wale hi janate hai jal kar roushan kar ........kya chij hoti hai .........hasate hasate jal jana.........

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  3. बहुत सुंदर सोच है आप की

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  4. रौशनी के जलवे चुराए ...सूरज का गबन किया ...मगर रौशनी तो परवाने के जलने पर ही हुई ...सुन्दर भावाभिव्यक्ति ...!!

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  5. गरीब की झोंपडी में कभी कभी महलों से ज्यादा ख़ुशी की रौशनी दिखाई देती है.
    सुन्दर भाव.

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  6. बहुत सुंदर भाव के साथ आपने उम्दा ग़ज़ल लिखा है !
    मेरे इस ब्लॉग पर आपका स्वागत है-
    http://ek-jhalak-urmi-ki-kavitayen.blogspot.com

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