अंग-अंग में
पीड़ा है,
कैसी
अद्भुत-अनहोनी पीड़ा है
पीड़ा का
संसार बसा है
पीड़ा का हर तार कसा है
मन फिर भी दुविधा में फंसा है
शिराओं में
धमनियों में बहती है पीड़ा
चुपचाप
भला कब रहती है पीड़ा
पर
पीड़ा की भाषा को समझे
ऐसा
साथी पाना तो कठिन है
पीड़ा का
साथी कौन - सगा कौन
पीड़ा
बड़बड़ाती है सन्निपात सी
सुख बैठा है मौन
पीड़ा
को समझेगा वह
जिसने पीड़ा को पाया है
यूं तो
बहुतेरे ने
पीड़ा का मीना बाजार सजाया है
रूक
जाओ यहीं
यहीं सुख है मस्ती है
मत
बढ़ो आगे
आगे तो पीड़ा की बस्ती है
पर
मैंने पीड़ा का स्वर पहचाना है
सदा
ही मैंने पीड़ा को अपना माना है
मैं पीड़ा को छोड़ भी दूं
पर नहीं पीड़ा मुझको त्यागेगी
चल दूंगा जिधर
वह मेरे
पीछे-पीछे भागेगी।
2-- एक टुकड़ा दर्द-कविता संग्रह से
18ण्3ण्1993
11ण्30 रात्रि
हर सप्ताह मेरी एक नई गज़ल व एक फ़ुटकर शे‘र हेतु
http://gazalkbahane.blogspot.com/
!!!
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गजब की कहानी है पीडा की हर एक दशा मे पीडा साथ साथ होती चलती है........
ReplyDeleteपीडा तो सहचरी है आने दीजिए
ReplyDeleteएक हद तक दर्द बढकर थम जायेगा.
सच में कई बार तो पीडा जीवन भर के लिए साथ ही हो जाती है..और अहसास दिलाती रहती है......
ReplyDeleteवाह बहुत बढ़िया लिखा है आपने! ये बिल्कुल सच है हमारी ज़िन्दगी में पीड़ा आती है पर कुछ वक्त के बाद वो दूर हो जाती है !
ReplyDeleteदर्द की अनुभूति अच्छी लगी। बधाई।
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