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Monday, July 6, 2009

वक्त के हाथ से छूटा -कविता


बचपन
किसी का भी हो
सलोना होता है
मगर यह
वक्त के हाथ से छूटा
मिट्टी का खिलौना होता है
जिसे पाकर
हर कोई हँसता है
जिसे खोकर
हर कोई रोता है
सचमुच जार-जार रोता है
ऐसा तो
यहां बार-बार होता है

16 comments:

  1. वाह अंतिम की पंक्तियो मे जान है ..........भाई साहब

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  2. बचपन
    किसी का भी हो
    सलोना होता है ।
    परन्‍तु एक उम्र में आकर हमें इसे खोना होता है, यह परम सत्‍य है बचपन की यादें ताउम्र साथ रहती हैं,बहुत ही सुन्‍दर अभिवयक्ति, आभार्

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  3. बहुत ही सुन्दर और सही अभिव्यक्ति है आभार्

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  4. बचपन का सलोनापन --
    वही सलोनापन है इस कविता मे
    बहुत सुन्दर

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  5. वाकई बार-बार होता है ...अच्छी रचना .

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  6. बहुत सही!!

    ऐसा ही बार बार होता है.

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  7. ... बहुत खूबसूरत रचना !!!!

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  8. वाह बहुत बढ़िया! आपकी इस सुंदर रचना को पड़कर मैं अपने बचपन के सुनहरे दिनों में चली गई थी!

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  9. जीवन को जीवंत करती रचना..
    बहुत सुन्दरता से आपने ज़िन्दगी की सच्चाई से हमें दो-चार करवा दिया..
    बहुत खूब..

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  10. Sundar rachnaa............ aksar man bachpan ki yaadon mein khoo jata hai........

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  11. इस रोने हंसने में अचानक वक़्त समाप्त !

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  12. वक्त के हाथ से छूटा मिट्टी का खिलौना.....गया सो गया...

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