देखकर हालत बुतों की:हर देश की सरकार जन-हिताय,जन-सुखाय नीतियाँ,योजनाएँ बनाकर उन्हे लागू करके जनता की स्थिति सुधारने का दावा ही नहीं करती बल्कि अपने किये-अनकिये क्रियाकलापों का गुणगान करने के लिये अखबारों मे पूरे सफ़े के विग्यापन जारी करती है.और अपने नेताओं की याद में या वोट बैंक को राजी करने के लिये चौराहों ,पार्कों मे नेताओ के मुस्कराते दमकते चेहरों भाव -भंगिमाओं वाले बुत लगा देते हैं,कहने को ये बुत आम जनता,युवा पीढी हेतु प्रेरणा के श्रोत हैं ,पर क्या वास्तव में ऐसा है ?
एक दिन टहलते हुए पार्क में लगी नेताजी सुभाषचंद्र बोस के बुत के पास पड़ी बैंच पर जा बैठा.पास ही एक दम्पति घास में बैठा था उनका ७-८ साल का बेटा धमाचौकड़ी मे मशगूल था,बच्चा बुत के पास आकर पत्थर पर खुदे नेताजी के विश्व प्रसिद्ध बोल अटक-अटक कर पढ़्ने लगा —-तु..म..मु..मुझे ..खू..खून..दो.खून दो फिर वह चिल्ला उठा.खू.अ अ न ,खून
खून-खून की चिल्लाहट सुन मां बाप चौंककर पास आ गये; पूछने लगे क्या हुआ ? कहां है खून ?
बच्चे ने नेताजी के बुत के नीचे इशारा करते हुए कहा ‘वो ! देखो’.लिखा खून देखकर उनकी जान में जान आई । वे हँसने लगे ,पिता बोला ‘बेटा इसमें डरने की क्या बात है ?’
बेटा रुआंसा होकर कहने लगा ‘हेल्प द पूअर फेलो ,ही इज इल ,ही नीडस ब्लड .पापा यह आदमी खून मांग रहा है । यह बीमार है,आप टी.वी वालों को बुलायें । वे उस दिन उस गरीब लड़्की के लिये ओ निगेटिव खून की अपील कर रहे थे; उसे खून मिल गया था, इसे भी मिल जायेगा प्लीज पापा टीवी वालों को फोन करें । बच्चा उत्तेजित था.उसका पिता उसे गोद में लेकर उस महान उक्ति का अर्थ समझाने की नाकाम कोशिश कर रहा था । बच्चे की बात ने मेरे मन को उद्वेलित कर दिया और मैं अपने नगर के और बुतों का हाल जानने के लिये निकज पड़ा, तो पाया कि नगर के बुतों की हालत वाकई खराब़ थी ।
गांधी जी की सफेद संगमरमर की प्रतिमा धूल से अटी पड़ी थी । उसपर बैठा कबूतर-कबूतरी का किलोल करता जोड़ा शायद उनके ब्रह्मचर्य के सिद्धान्त की धज्जियां उखाड़्ने की फ़िराक में था ।
आगे चलकर पाया कि बाबा साहेब की एक उंगली पर एक कव्वा बैठा था तथा दूसरे हाथ में पकड़े संविधान पर दूसरा कव्वा काबिज था तथा अपनी काक-द्रिष्टि से संदेहात्मक ताक-झांक कर रहा था । चंद्रशेखर आज़ाद के पिस्तोल पर बैठी एकाकी फ़ाख्ता संभवत: अमन का संदेश देने के मूड मे थी मगर श्रोताओं के अभाव मे मौन धारण किये थी ।
सरदार भगत सिहं के बुत के नीचे बैठे दो मज़दूर बीड़ी का धुंआ उगल रहे थे.वे शायद किसी जीवित सिक्ख के सामने ये हरकत न कर पातेक । एक और नजारा इस तरह था कारगिल में शहीद हुए दो जवानो के पिद्दी से बुतों के बीच एक स्थानीय नेता की विशाल रौबीली प्रतिमा विराजमान थी.वहीं दीवार पर किसी सुधि दर्शक ने लिख दिया था –
जो था कभी सिंह आज मिरगछौना हुआ
नेताजी के बुत के आगे शहीद बौना हुआ
आगे चला तो अनहोनी की आशंका से दिल दहल उठा एक जातीय नेता के बुत पर कई बच्चे चढ़े हुए थे । मुझे लगा कि उनके खेल खेल में कहीं नेताजी की बाँह या नाक टूट गई तो लेने के देने पड़ जाएंगे .क्योंकि ऐसा होते ही छुटभैये नेता जो ऐसे अवसरों की ताक में ही रहते हैं उन्हे राजनीति व अखबारों की सुर्खियों मे आने का मौका मिल जाएगा । वे धरना ,जाम पर उतर आएंगे और पुलिस को लाठी भांजने की सुविधा मिल जायेगी । विरोधी पार्टियों को भी तो मुद्दा मिल जाएगा सरकार को कोसने का और इस सब को भुगतेगी जनता । यह सब सोचकर मैने ब्च्चों को हड़्काया तो वे वहां से भाग निकले । मुझे एक सार्थक काम करने का सुखद अहसास हुआ.यही नहीं एक चौराहे पर तो कैलाशवासी भगवान शिव को भगतों ने लोहे के कारागार में बंदी बनाकर बैठा रखा था- कारण चढ़ावे की सुरक्षा करना था. मेरे जहन में एक सवाल तब से बैठा है कि क्या हम अपने नेताओं के बुत चौराहे पर लगा कर क्या सचमुच नवपीढ़ी को कोई प्रेरणा दे पा रहें हैं या बैठे बिठाये इन राजनैतिक छुट- भैयों को दंगे फैलाने की,सामाजिक समस्यायें पैदा करने के हथियार सौंप रहे हैं,अगर आंकड़े एकत्रित कियें जायें तो पता लगेगा कि बुतों की तोड़-फोड़ से उत्पन्न जातीय व साम्प्रदायिक झगड़ों से कानून व्यवस्था बिगड़्ने एवं उसे काबू करने में न केवल देश की करोड़ों की सम्पति का नुकसान होता है अपितु कितने बेकसूर लोगों की जान जाती है ।
मेरी अल्प समझ के अनुसार अगर बुत लगाने आवश्यक ही हैं तो राज्यस्तर पर एक म्यूजियम बना दिया जाये,जहां जो भी संस्था या पार्टी बुत लगाना चाहे अनुमति लेकर त्तथा एक सुनिश्चित एकमुश्त न्यास राशि जमा करवाकर बुत लगाले तथा नेताजी के निर्वांण या-जन्म दिवस पर म्यूजिम के प्रांगण में उत्सव मना ले । भगवानों- महात्माओं की प्रतिमाएं केवल मंदिरों या सभागारों में ही लगाईं जायें । इसका सुन्दर उदाहरण चंडीगढ़ या कोटा शहर है जहां के चौराहे फ़ूलों से लदे हुए आँखो व मन को मोह लेते हैं ।
आज बुतों के हालात देखकर तो ये पंक्तिया मन मे उभरतीं हैं—
देखकर हालत बुतों की हैं लगाते
टूटने को आइनो से होड़ पत्थर
श्यामसखा ‘श्याम’१२ विकास रोहतक १२४०01
हर सप्ताह मेरी एक नई गज़ल व एक फ़ुटकर शे‘र हेतु http://gazalkbahane.blogspot.com/
!!!
Friday, September 10, 2010
Sunday, August 1, 2010
बूढा वक्त और बेहया आवाज
मैं
सुनसान अंधेरों
के जंगल में
भटक रहा था
कि तेरी आवाज
रोशनी बनकर आई
और मेरा हाथ पकड़ कर
चलने लगी
बूढे वक्त को,
आवाज का ऐसा
करना
बेहयाई लगा
उसने आवाज को,गूंगा कर दिया
और मेरे रास्तों को
फ़िर अंधेरों से भर दिया
तब से अब तक
मैं सुनसान अंधेरों के
जंगल में
तेरी आवाज को
आवाज देता हूं
और फिर
खाली हाथ लौटी
अपनी आवाज को सुनता हूं
अंधेरो में स्वयं को
टटोलता हूं
सिर धुनता हूं
हर सप्ताह मेरी एक नई गज़ल व एक फ़ुटकर शे‘र हेतु http://gazalkbahane.blogspot.com/
Wednesday, June 9, 2010
बहुत कठिन तो नहीं है जीना- श्याम सखा
कठिन तो नहीं है जीना
रोटी तो
सेठ मजदूर
सभी को देता है करतार
्पीने को
पानी भी उपलब्ध है
सभी जीवों को
किसी को बोतल में बन्द
मिनरल वाटर
तो किसी को पोखर का जल
हाँ तब तक जीना कठिन नहीं है
जब तक हम जीते हैं बायलॉजिकल जीवन
जीना कठिन हो जाता है,
बुद्धिजीवी बनते ही
भैंस या गाय जुगाली करते हैं
निगले हुए खाद्य की
जबकि बुद्धिजीवी जुगाली करता है
विचारों की
तर्कों की कुतर्कों की
तर्कों की कुतर्कों की
और उलझ जाता है खुद भी
उलझा लेता है
औरों को भी
अपने बनाये जाल में जंजाल में
इसीलिये कठिन हो जाता है
जीवन इस धरा पर
मनुष्य का९/६/२०१० १०.०५ सुबह
हर सप्ताह मेरी एक नई गज़ल व एक फ़ुटकर शे‘र हेतु http://gazalkbahane.blogspot.com/
Sunday, May 9, 2010
औरत अबला रही होगी कभी -
अपने अपने हस्तिनापुर
बंधे थे
राजा दशरथ
अपने वचन से
इसलिए दु:ख पाए
या फिर शापगzस्त थे
श्रवण के
अंधे माता-पिता के श्राप से
मैं मगर
क्यों हूं दुखी
बंध गया हूं
कुछ अपावन सहूलियतों
में
एक अदद घर
या मकान
जिसकी कर्जे की किश्त
चुकाते-चुकाते शायद मैं स्वयं चुक जाÅंगा
घर में बिजली है
पानी है
उसका बिल भी तो देता हूं
अपने पसीने को बहाकर
फिर गृहकर
मरम्मत सफेदी
फर्नीचर हर चीज तो खून की किश्त
मांगती है
और एक अदद
औरत जो पत्नी की उपाधि से
विभूषित है
कभी औरत अबला रही होगी
अब तो अशक्त है पुरूष
संसर्ग के लिए भी
तो याचना करते हुए इंतजार करता है।
पत्नी नामक औरत
के बच्चे हैं
हां सत्य तो यही है
कि वे पत्नी के बच्चे हैं
वे पुरूष पति के
भी बच्चे हैं
यह कथन या तो महज छलावा है
या फिर
भzमित विश्वास
जो सत्य की कसौटी पर
शायद ही पूरा उतर सके
बच्चों की जरूरतें हैं
फीस टयूशन स्वीमिंग पूल
हाWबी क्लास टूअर यात्रा
जेब खर्च
कपड़ा लत्ता तन ढंकने को नहीं
बदलते फैशन
से रफ्तार मिलाने के लिए
और बदले में क्या
मिलता है ?
वही दशरथ
जैसा असहायपन
वही कुछ न, वही अशक्त संज्ञा
वहीं कुछ न, वही निश्वास
बस और क्या
पैर लग जाता है
बेटे का पैर लग जाता है
मैगजीन से
किताब से
उठाता उस किताब को
माथे से लगाता
माफी मांगता है
मगर
कुचल देता है
रौंदे देता है
मां बाप का दिल
अपने कंटीले तनाव भरे
व्यवहार से
माफी मांगना तो दूर
महसूस भी नहीं करता
कहता क्या किया है उसने।
बेटी भी
मस्त है, सपने देखती है
सपने बुनती है
पत्नी भी
अब कहाँ उसकी सुनती है
उसका घर-संसार
रिश्ते नाते-किट~टी पार्टियाँ है
पति के लिए
उसे भी फुर्सत कहाँ है?
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बंधे थे
राजा दशरथ
अपने वचन से
इसलिए दु:ख पाए
या फिर शापगzस्त थे
श्रवण के
अंधे माता-पिता के श्राप से
मैं मगर
क्यों हूं दुखी
बंध गया हूं
कुछ अपावन सहूलियतों
में
एक अदद घर
या मकान
जिसकी कर्जे की किश्त
चुकाते-चुकाते शायद मैं स्वयं चुक जाÅंगा
घर में बिजली है
पानी है
उसका बिल भी तो देता हूं
अपने पसीने को बहाकर
फिर गृहकर
मरम्मत सफेदी
फर्नीचर हर चीज तो खून की किश्त
मांगती है
और एक अदद
औरत जो पत्नी की उपाधि से
विभूषित है
कभी औरत अबला रही होगी
अब तो अशक्त है पुरूष
संसर्ग के लिए भी
तो याचना करते हुए इंतजार करता है।
पत्नी नामक औरत
के बच्चे हैं
हां सत्य तो यही है
कि वे पत्नी के बच्चे हैं
वे पुरूष पति के
भी बच्चे हैं
यह कथन या तो महज छलावा है
या फिर
भzमित विश्वास
जो सत्य की कसौटी पर
शायद ही पूरा उतर सके
बच्चों की जरूरतें हैं
फीस टयूशन स्वीमिंग पूल
हाWबी क्लास टूअर यात्रा
जेब खर्च
कपड़ा लत्ता तन ढंकने को नहीं
बदलते फैशन
से रफ्तार मिलाने के लिए
और बदले में क्या
मिलता है ?
वही दशरथ
जैसा असहायपन
वही कुछ न, वही अशक्त संज्ञा
वहीं कुछ न, वही निश्वास
बस और क्या
पैर लग जाता है
बेटे का पैर लग जाता है
मैगजीन से
किताब से
उठाता उस किताब को
माथे से लगाता
माफी मांगता है
मगर
कुचल देता है
रौंदे देता है
मां बाप का दिल
अपने कंटीले तनाव भरे
व्यवहार से
माफी मांगना तो दूर
महसूस भी नहीं करता
कहता क्या किया है उसने।
बेटी भी
मस्त है, सपने देखती है
सपने बुनती है
पत्नी भी
अब कहाँ उसकी सुनती है
उसका घर-संसार
रिश्ते नाते-किट~टी पार्टियाँ है
पति के लिए
उसे भी फुर्सत कहाँ है?
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Thursday, April 22, 2010
क्या फर्क पड़ता है
क्या
फर्क पड़ता है
मेरे
जीने या मरने से ?
क्योंकि
मैं ना तो
जीते जी धरती पर बोझ हूँ
ना ही
मेरे मरने से दुनिया
खाली होने वाली है
क्या फर्क पड़ता है
मेरे जीने या मरने से
हाँ कुछ अन्तर
अवश्य आएगा
उस जगह, घर या
आसपास में
जहां मैंने इस
नाकुछ जीवन
के पचास साल
गुजार दिए हैं
मेरे बिस्तर का
वह हिस्सा खाली हो जाएगा
जहाँ मैं सोता हूँ
और मेरी पत्नी
कहलाने वाली औरत
को अकेले सोना पड़ेगा
क्येांकि वह
एक घरेलू भारतीय
महिला है
तथा जवान होते
बच्चों की माँ है,
कोई और
विकल्प भी तो नहीं हैं
उसके पास।
मेरे बेटे के
पास आ जाएगा अधिकार
मेरी जमा पूँजी को
अपने हिसाब से खर्च करने
का
इसलिए उसके आँसू
उसका गम
पत्नी के गम की तुलना में
क्षणिक होगा
मेरे दफ्तर की कुर्सी भी
एक दिन
के लिए
खाली हो जाएगी
फिर काबिज
हो जाएगा उस पर
बाबू राम भरोसे
बहुत दिन
से प्रतीक्षा में है
बेचारा
मेरी पुरानी साइकिल
को ले जाएगा कबाड़ी
क्योंकि
वह नहीं रह जाएगी
पहले भी कब थी ?
इस घर के लायक।
अलबत्ता
‘बुश’ मेरा कुत्ता
शायद ‘मिस’ करेगा
सुबह सुबह
मेरे साथ टहलना।
क्योंकि कोई और उसे
बाहर नहीं ले
जाता अल सुबह ;
पर शायद
उसके बरामदे का फर्श
खराब करने की आदत
से तंग आकर
पत्नी संभाल लेगी ;
यह काम भी,
और बुश भी
भूल जाएगा
मेरा दुलारना डाँटना दोनों
क्या फर्क
पड़ता है
मेरे जीने से
या मरने से ?
जीते जी मैं
बोझ नहीं हूँ
धरती पर
और मेरे मरने से
दुनिया नहीं है
खाली होने वाली
हर सप्ताह मेरी एक नई गज़ल व एक फ़ुटकर शे‘र हेतु
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फर्क पड़ता है
मेरे
जीने या मरने से ?
क्योंकि
मैं ना तो
जीते जी धरती पर बोझ हूँ
ना ही
मेरे मरने से दुनिया
खाली होने वाली है
क्या फर्क पड़ता है
मेरे जीने या मरने से
हाँ कुछ अन्तर
अवश्य आएगा
उस जगह, घर या
आसपास में
जहां मैंने इस
नाकुछ जीवन
के पचास साल
गुजार दिए हैं
मेरे बिस्तर का
वह हिस्सा खाली हो जाएगा
जहाँ मैं सोता हूँ
और मेरी पत्नी
कहलाने वाली औरत
को अकेले सोना पड़ेगा
क्येांकि वह
एक घरेलू भारतीय
महिला है
तथा जवान होते
बच्चों की माँ है,
कोई और
विकल्प भी तो नहीं हैं
उसके पास।
मेरे बेटे के
पास आ जाएगा अधिकार
मेरी जमा पूँजी को
अपने हिसाब से खर्च करने
का
इसलिए उसके आँसू
उसका गम
पत्नी के गम की तुलना में
क्षणिक होगा
मेरे दफ्तर की कुर्सी भी
एक दिन
के लिए
खाली हो जाएगी
फिर काबिज
हो जाएगा उस पर
बाबू राम भरोसे
बहुत दिन
से प्रतीक्षा में है
बेचारा
मेरी पुरानी साइकिल
को ले जाएगा कबाड़ी
क्योंकि
वह नहीं रह जाएगी
पहले भी कब थी ?
इस घर के लायक।
अलबत्ता
‘बुश’ मेरा कुत्ता
शायद ‘मिस’ करेगा
सुबह सुबह
मेरे साथ टहलना।
क्योंकि कोई और उसे
बाहर नहीं ले
जाता अल सुबह ;
पर शायद
उसके बरामदे का फर्श
खराब करने की आदत
से तंग आकर
पत्नी संभाल लेगी ;
यह काम भी,
और बुश भी
भूल जाएगा
मेरा दुलारना डाँटना दोनों
क्या फर्क
पड़ता है
मेरे जीने से
या मरने से ?
जीते जी मैं
बोझ नहीं हूँ
धरती पर
और मेरे मरने से
दुनिया नहीं है
खाली होने वाली
हर सप्ताह मेरी एक नई गज़ल व एक फ़ुटकर शे‘र हेतु
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Wednesday, March 31, 2010
फायदा
इस
गूंगेपन से
बहुत फायदा हुआ है
मुझको
कि मौलवी की
अजान की जगह
खुदा
सुनता है दास्तां मेरी
हर सप्ताह मेरी एक नई गज़ल व एक फ़ुटकर शे‘र हेतु
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गूंगेपन से
बहुत फायदा हुआ है
मुझको
कि मौलवी की
अजान की जगह
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Saturday, March 13, 2010
मुझे अब तक आस्कर नहीं मिला
मुझे
अब तक आस्कर
नहीं मिला
न ही भविष्य में
मिलने की कोई संभावना है
क्योंकि
मैं सपने बेचता नहीं
सपने देखता हूं
और मेरे सपने न तो रंगीन
न ही ग्लैमरस
बेचारे मेरे सरीखे श्वेत-श्याम ही होते हैं
और मेरे जैसे
आम आदमी के सपने
ग्लैमरस कैसे हो सकते हैं
मेरे सपनों में
मेरा पेट भर जाता है
मन तृप्त हो जाता है
डकार लेता है
मेरे बेटे बेटी
पहुंच जाते हैं स्कूल
साफ़ सुथरी वरदी पहने
पर जैसे
ही आंख खुलती है
सच सामने आ खड़ा होता है
आंते मेरी खाली आंते
कुलबुला रही होती हैं भूख से
पत्नी बीमार है
इसलिये जाना पड़ता है
मेरी बेटियों को
कोठियों में झाडू-पौचा लगाने
बरतन मांजने
कहिये
भला
मुझे कभी मिल सकता है
हर सप्ताह मेरी एक नई गज़ल व एक फ़ुटकर शे‘र हेतु
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अब तक आस्कर
नहीं मिला
न ही भविष्य में
मिलने की कोई संभावना है
क्योंकि
मैं सपने बेचता नहीं
सपने देखता हूं
और मेरे सपने न तो रंगीन
न ही ग्लैमरस
बेचारे मेरे सरीखे श्वेत-श्याम ही होते हैं
और मेरे जैसे
आम आदमी के सपने
ग्लैमरस कैसे हो सकते हैं
मेरे सपनों में
मेरा पेट भर जाता है
मन तृप्त हो जाता है
डकार लेता है
मेरे बेटे बेटी
पहुंच जाते हैं स्कूल
साफ़ सुथरी वरदी पहने
पर जैसे
ही आंख खुलती है
सच सामने आ खड़ा होता है
आंते मेरी खाली आंते
कुलबुला रही होती हैं भूख से
पत्नी बीमार है
इसलिये जाना पड़ता है
मेरी बेटियों को
कोठियों में झाडू-पौचा लगाने
बरतन मांजने
कहिये
भला
मुझे कभी मिल सकता है
हर सप्ताह मेरी एक नई गज़ल व एक फ़ुटकर शे‘र हेतु
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