!!!

Wednesday, March 31, 2010

फायदा

इस


गूंगेपन से


बहुत फायदा हुआ है


मुझको


कि मौलवी की


अजान की जगह


खुदा


सुनता है दास्तां मेरी


हर सप्ताह मेरी एक नई गज़ल व एक फ़ुटकर शे‘र हेतु
http://gazalkbahane.blogspot.com/

Saturday, March 13, 2010

मुझे अब तक आस्कर नहीं मिला

 मुझे
अब तक आस्कर
नहीं मिला
न ही भविष्य में
मिलने की कोई संभावना है
क्योंकि
मैं सपने बेचता नहीं
सपने देखता हूं
और मेरे सपने न तो रंगीन
न ही ग्लैमरस
बेचारे मेरे सरीखे श्वेत-श्याम ही होते हैं

और मेरे जैसे
आम आदमी के सपने
ग्लैमरस कैसे हो सकते हैं
मेरे सपनों में
मेरा पेट भर जाता है

मन तृप्त हो जाता है
डकार लेता है
मेरे बेटे बेटी
पहुंच जाते हैं स्कूल

साफ़ सुथरी वरदी पहने

पर जैसे
ही आंख खुलती है
सच सामने आ खड़ा होता है
आंते मेरी खाली आंते 
कुलबुला रही होती हैं भूख से

पत्नी बीमार है

 इसलिये जाना पड़ता है
मेरी बेटियों को

कोठियों में झाडू-पौचा लगाने
बरतन मांजने
कहिये

भला
मुझे कभी मिल सकता है





























हर सप्ताह मेरी एक नई गज़ल व एक फ़ुटकर शे‘र हेतु
http://gazalkbahane.blogspot.com/

Saturday, February 27, 2010

जो बात है तेरी आंखो में कहां वो किसी बन्दूक की गोली में

 करता हूं  हर साल
तेरा इन्तजार होली में






तू आए तो मने दीवाली
मेरे दिल की खोली में












और फ़िर ऐ जानेमन
आए मुन्ना या मुन्नी
हर साल तेरी झोली में







 जो बात है तेरी आंखो में
कहां वो किसी बन्दूक की गोली में








राधा का श्याम है वो तो-मीरा का श्याम है
गोपियों मे मिल जाएगी इक आध मुझे भी
यह सोच के बना था  मैं ‘श्याम सखा’ ग्वाल टोली में







पर मीरां राधा ही नही
फ़िदा थीं सब गोपियां श्याम पर
नहीं टपका कोई हसीन आम मेरी झोली में








बुरा न माने कोई गोपी
और ‘श्याम’ जी आप भी
मुझको चढी है इस बार भी भांग होली में







to enjoy one more such poem klik  here

यही तो होली की मस्ती है

हर सप्ताह मेरी एक नई गज़ल व एक फ़ुटकर शे‘र हेतु
http://gazalkbahane.blogspot.com/

Wednesday, February 24, 2010

सूरज के घर का रास्ता-

दिन
अजनबी सा उगा
सुबह ने
अंगड़ाई लेकर
दोपहर को
बुलावा भेजा
दोनो सहेलियां
बैठकर
शाम की
बुराई करने लगीं
शाम बेचारी
बूढी सास सी
बहरी बनी सुनती रही
 और सूरज भगवान से
मौत की दुआ
मांगने लगी
सब भगवानो की मानिन्द
सूरज दयालु था
उसने अपने डैने
समेटे और
उड़ गया
सुबह और दोपहर
ने काम निबटाया
और ख्वाबों की
आगोश में समा  गईं
शाम तारों के मनके
गिनती
चांद से
सूरज के घर का
रास्ता पूछती-पूछती जागती रही




























हर सप्ताह मेरी एक नई गज़ल व एक फ़ुटकर शे‘र हेतु
http://gazalkbahane.blogspot.com/

Sunday, February 21, 2010

तुम गईं

 तुम
गईं
बन
दुल्हन
नईं,
व्यथा
बीते
दिनों
की
मैने
सही
                                       कब
                                       किससे
                                       कही.








हर सप्ताह मेरी एक नई गज़ल व एक फ़ुटकर शे‘र हेतु
http://gazalkbahane.blogspot.com/

Friday, February 19, 2010

कल्चर नहीं एग्रीकल्चर

हाँ
कला,संस्कृति
कल्चर के
नाम पर
हमारे पास थे
सिर्फ़
हल बैल
धरती फ़ावड़े
कुदाल बीज खरपतवार
इसीलिये
आप कहते हैं
हमारे पास
कल्चर के नाम पर
है सिर्फ़ एग्रीकल्चर
हम इन
तथ्यों को
जो आप बार-बार
गाली की तरह
फ़ेंक देते हैं
हमारी निरीह पसीने
में गंधाती देहों पर
हाँ
हम इन
तथ्यों को
नहीं नकारते
पर एक सवाल
बकौल आपकेहमारे कुंद जहन में
यह सवाल
बवंडर सा उठता है
अगर आप
कृपा करें
तो हम पूछ लें
आपसे श्रीमान्‌ !
कुरूक्षेत्र को झेला हमने
अठारह अक्षोहणि
सेनाओं का रक्त
बहता है
हमारी अनकल्चर्ड धमनियों में
आज भी
गूंजता हैं मराठों,तुर्को,सिखों
राजपूतो की खड्ग तलवारों की
झनझनाहट
का शोर
पानीपत की धरती पर
तैरती गर्म हवाओं में

अनेक
वीरों
के साथ दफ़न हैं
अनेकानेक
निरीह काश्तकारों के शव
हम खेत
होते रहे
हमेशा-हमेशा से
कभी इन्द्र-प्रस्थ
कभी दिल्ली को
बचाने की खातिर
और चलाते रहे हल कुदाल
फ़ावड़े
जिससे भरे पेट
आप श्रीमान का
और ले सकें
आप आनन्द
ठुमरी गजल
या ध्रुपद का

शायद
आप भी एक शास्वत सच
जानते हैं
भूखे भजन न होहिं गोपाला
कभी पढें
आप हमें भी
और जब पढें
तो दिल से पढें
हमारे दुख
हमारी पीड़ा
और सुने हमारी
छाती से उठते उन्मुक्त ठहाके
उन ठहाकों से ही
तो निकलते हैं
ध्रुपद-और ठुमरी
हम हैं हरियाणा के
स्वाभिमानी
किसान
हम जमीन से जुड़े हैं
अक्खड़ नहीं हैं हम























हर सप्ताह मेरी एक नई गज़ल व एक फ़ुटकर शे‘र हेतु
http://gazalkbahane.blogspot.com/

मुखौटे और यथार्थ



प्यार को
मुखौटे मत पहनाओ
मानता हूँ
सभी मुखौटे
बुरे नहीं होते
कुछ तो
यथार्थ से भी सुन्दर होते हैं

पर मुखौटे
मुखौटे हैं
यथार्थ नहीं
बुरा या भला
मुखौटा
यथार्थ को ढक लेता है
अपनी अच्छाई या बुराई से
यथार्थ
को यथार्थ रहने दो
मत
औढ़ाओ उसे
अच्छाई या बुराई ।

प्यार भी
सिर्फ प्यार रहे
न अच्छा
न बुरा-प्यार बस प्यार
न हो
वह देह
न हो देह व्यापार
17ण्2ण्96



हर सप्ताह मेरी एक नई गज़ल व एक फ़ुटकर शे‘र हेतु
http://gazalkbahane.blogspot.com/