चलोचलोइन जानी पहचानीपगडंडियों कोछोड़ करबीहड़ में चलें,और वहाँ पहुंच कर,पीठ से पीठमिलाकर खड़े हो जाएंऔर सफरशुरू करेंअलग-अलगएक दूसरे से विपरीत दिशा मेंऔर भूल जाएं कि धरतीगेंद की तरह गोल है,चलते रहें तब तकजब तक पाँव थक करगति को नकार न दें,चलते रहे तब तकजब तक सूरज की पीठ न आ जाए,तब तकजब तकअन्धेरा, बूढ़े बरगद कीकोपलों परशिशु से कोमलपाँव रखता,शाखाओं पर भागता,तने से उतरकरधरती पर बिखर न जाए,चलते रहेंतब तकजब तकबारहसिंगों की आँखेंचमकने न लगे चारों ओरऔर फिरएक स्तब्धताछा जाएमौत सी।चमकती आँखें दौड़ने लगे
तितर-बितर,
फिर एकदहाड़ यमराज सी दहाड़,जम जाएरात की छाती पर।मैं टटोलता साआगे बढूंऔर छू लूँ तुम्हारीगठियाईउंगलियों कोचलो जानी पहचानीपगडंडियों को छोड़ करचल देबीहड़ मेंआज हम15.7.96 9 बजे रात
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