!!!

Thursday, October 29, 2009

सूरज का गबन


दिल के
अंधेरे मिटाने
के लिये
हमने क्या-क्या
नहीं किया
रोशनियों के जलवे चुराये
सूरज का गबन किया
पर
पूनमी रात भी
उजला सकी
मेरी खिड़कियां
तभी एक पतंगा
जल मरा
सामने की झोपड़ी
के टिमटिमाते दीये की लौ पर
और
सारा जहां
रोशन हो गया




आज यहां http://gazalkbahane.blogspot.com/ यह गज़ल पढ़ें

पहले देंगे जख्म और फिर--- गज़ल

Tuesday, October 27, 2009

चुपचाप भला कब रहती है पीड़ा- श्याम

अंग-अंग में
पीड़ा है,
कैसी
अद्‍भुत-अनहोनी पीड़ा है
पीड़ा का
संसार बसा है
पीड़ा का हर तार कसा है
मन फिर भी दुविधा में फंसा है
शिराओं में
धमनियों में बहती है पीड़ा
चुपचाप
भला कब रहती है पीड़ा
पर
पीड़ा की भाषा को समझे
ऐसा
साथी पाना तो कठिन है
पीड़ा का
साथी कौन - सगा कौन
पीड़ा
बड़बड़ाती है सन्निपात सी
सुख बैठा है मौन
पीड़ा
को समझेगा वह
जिसने पीड़ा को पाया है
यूं तो
बहुतेरे ने
पीड़ा का मीना बाजार सजाया है
रूक
जाओ यहीं
यहीं सुख है मस्ती है
मत
बढ़ो आगे
आगे तो पीड़ा की बस्ती है
पर
मैंने पीड़ा का स्वर पहचाना है
सदा
ही मैंने पीड़ा को अपना माना है
मैं पीड़ा को छोड़ भी दूं
पर नहीं पीड़ा मुझको त्यागेगी
चल दूंगा जिधर
वह मेरे
पीछे-पीछे भागेगी।



2-- एक टुकड़ा दर्द-कविता संग्रह से
18ण्3ण्1993
11ण्30 रात्रि




हर सप्ताह मेरी एक नई गज़ल व एक फ़ुटकर शे‘र हेतु
http://gazalkbahane.blogspot.com/

Monday, October 19, 2009

रोशनी की आवाज--श्याम सखा

मैं
सुनसान अन्धेरों
के जंगल में
भटक रहा था
कि तेरी आवाज
रोशनी बनकर आई
और मेरा हाथ पकड़ कर
चलने लगी
बूढ़े वक्त को
आवाज का ऐसा
करना
बेहयाई लगा
उसने
आवाजू को गूंगा कर दिया
और
मेरे रास्तों को
फिर अन्धेरों से भर दिया
तब से
अब तक
मैं सुनसान अन्धेरों के
जंगल में
तेरी आवाज को
आवाज देता हूं
और फिर
खाली हाथ
वापिस लौटी
आपनी आवाज को सुनता हूं
अन्धेरों में स्वयं को
टटोलता हूं
सिर धुनता हूं।


दिसंबर 25 रात्रि 11ण्30



हर सप्ताह मेरी एक नई गज़ल व एक फ़ुटकर शे‘र हेतु
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Thursday, October 15, 2009

एक टिप्पणी-हाय टिप्पणी


बहुत सुन्दर, बहुत अच्छे, भईई वाह टिपणी कर
बुरे अच्छे की मत कर यार तू परवाह टिपणी कर

बहर पर हो हो कोई गज़ल तो भी तू कुछ सोच
दिखे चाहे कोई भाव या अल्लाह टिपणी कर

हमें भी तो सिखा दें आप लिखना ये गज़ल साहिब
रहें कहते सुन कुछ और दे इस्लाह टिपणी कर

मानेगा तू तो पछताएगा इक दिन बहुत ज्यादा
तुझे दोस्त करता हूं मैं आज आगाह टिपणी कर



अगर जो तू कहीं लग जाएगा उनको सिखाने तो
सभी नाराज होंगे तू कहेगा आह, टिपणी कर

रकीबों से निपटना सीख मेरे यार बनकर अनाम
निभा तू भी ब्लागिंग की ये रस्मो-राह टिपणी कर

लिखे अब कौन है रचना, पढे़ है कौन अब रचना,
किये जा पोस्ट बस सप्ताह दर सप्ताह टिपणी कर

यहां भी चलती गुट-बाजी,बना तू भी तो गुट अपना
करे जो तुझको टिपणी कर उसे तू वाह टिपणी कर



अगर है चाह टिप्पणियां मिलें तुझको बहुत सारी
तो लिख टिपणी पे टिपणी सब को कर गुमराह टिपणी कर

लिखेंगे तेरे ब्लोगों पर सभी टिपणी ,बहुत सुन्दर
बनेंगे लोग सारे ही तेरे हमराह टिपणी कर



'सखा' ने देख,अनुभव कर लिखा यह सब ब्लागिंग पर
तो है यह गज़ल कोई तू जर्राह टिपणी कर

हर सप्ताह मेरी एक नई गज़ल व एक फ़ुटकर शे‘र हेतु
http://gazalkbahane.blogspot.com/

Friday, October 9, 2009

कहो कि जीना है


कहो कि जीना है
कहो कि जीना है
माना तुम्हारा मरना
बहुत कम को खलेगा
पर इससे
घर का खर्च तो बढ़ेगा
क्या
नहीं नौ मन लकड़ी से
दो महीने चूल्हा जलेगा?
कफ+न से दो कमीज सिलेंगे
स्कूल की ड्रेस के
झीनी - सी
रजाई में
तुम्हारे साथ सोने से

बच्चों
को सर्दी तो नहीं सताएगी
तुम
मर गए तो भला पत्नी टिकुली कैसी लगाएगी?
पांच बच्चों
के अलावा
कभी कुछ दिया है
उसको

जो
यह सांकेतिक सुख भी छीना है
कहो
कि जीना है कबन्ध हुए हो तो क्या डर है?
यहां कौन
तुमसे कद्दावर है?
किसके कन्धों पर
अब सर है?
अब यहां
या तो भुतहा सन्नाटा है
या फिर
हर-हर महादेव अल्लाहो-अकबर है
रहो
इस दुनिया में बहुत काला गाढ़ा धुंआ फैला है
नीला अम्बर हुआ मटमैला है
मत भागो
गंगा जल में
घुला हलाहल
और किसी को नहीं,
तुम्हें ही पीना है

कहो
कि जीना है
माना
रोटी रोजी के लाले हैं
माना
लोगों ने आस्तीनों में सांप पाले हैं
पर कुछ वे भी तो हैं,
जो
अपने हाथों पर आसमान संभाले हैं
तुम भी
तो
कुछ कर दिखलाओ

सब को
मिलकर ही
धरती का
फटा दिल सीना है
कहो कि
जीना है।

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Tuesday, September 22, 2009

जब तक सूरज की पीठ न आ जाए,..---...कविता

चलो

चलो
इन जानी पहचानी
पगडंडियों को
छोड़ कर
बीहड़ में चलें,
और वहाँ पहुंच कर,
पीठ से पीठ
मिलाकर खड़े हो जाएं
और सफ
शुरू करें
अलग-अलग
एक दूसरे से विपरीत दिशा में
और भूल जाएं कि धरती
गेंद की तरह गोल है,
चलते रहें तब तक
जब तक पाँव थक कर
गति को नकार न दें,
चलते रहे तब तक
जब तक सूरज की पीठ न आ जाए,
तब तक
जब तक
अन्धेरा, बूढ़े बरगद की
कोपलों पर
शिशु से कोमल
पाँव रखता,
शाखाओं पर भागता,
तने से उतरकर
धरती पर बिखर न जाए,
चलते रहें
तब तक
जब तक
बारहसिंगों की आँखें
चमकने न लगे चारों ओर
और फिर
एक स्तब्धता
छा जाए
मौत सी।
चमकती आँखें दौड़ने लगे
तितर-बितर,
फिर एक
दहाड़ यमराज सी दहाड़,
जम जाए
रात की छाती पर।
मैं टटोलता सा
आगे बढूं
और छू लूँ तुम्हारी
गठियाई
उंगलियों को
चलो
जानी पहचानी
पगडंडियों को छोड़ कर
चल दे
बीहड़ में
आज हम



15.7.96 9 बजे रात



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विश्वास रखें आप का समय व्यर्थ न जाएगा।

Friday, September 18, 2009

शक की फ़फ़ूंदो से



रिश्ते
दो तरह के होते हैं
एक जन्म के
साथ
समाज द्वारा
उपहार में मिले
चाचा ताऊ
मौसी ,बूआ सरीखे
जोचाहे-अन्चाहे
ढोने पड़ते हैं ताउम्र
इसके अलावा

कोई दूसरा विकल्प
नहीं होता
मेरे-तुम्हारे या
किसी के पास

दूसरे रिश्ते
घर कर लेते है
अनायास ही
मन की गुफ़ा में
इन्हे नाम देते हैं लोग
दोस्ती या प्यार
अस्ल में
केवल यही
रिश्ते हैं हकदार
संबंध कहलाने के
संबन्ध ?
जी
यही तो है
जो देते है
गरिमा
समान बन्धन की
इनकी उष्मा से
चलती है
जिन्दगी की
नाव मन्थर गति से
और झेल लेती है
जिन्दगी के समंदर
में उठे तूफ़ानो को
या मन में
उमड़े भूचालों को
बहुत कोमल
बहुत खूबसूरत होते हैं
ये संबन्ध
बचाये रखें इन्हे
शक की फ़फ़ूंदो से
जुबां के मिसाइलों से
अविश्वास की महामारी से











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