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Friday, September 18, 2009

शक की फ़फ़ूंदो से



रिश्ते
दो तरह के होते हैं
एक जन्म के
साथ
समाज द्वारा
उपहार में मिले
चाचा ताऊ
मौसी ,बूआ सरीखे
जोचाहे-अन्चाहे
ढोने पड़ते हैं ताउम्र
इसके अलावा

कोई दूसरा विकल्प
नहीं होता
मेरे-तुम्हारे या
किसी के पास

दूसरे रिश्ते
घर कर लेते है
अनायास ही
मन की गुफ़ा में
इन्हे नाम देते हैं लोग
दोस्ती या प्यार
अस्ल में
केवल यही
रिश्ते हैं हकदार
संबंध कहलाने के
संबन्ध ?
जी
यही तो है
जो देते है
गरिमा
समान बन्धन की
इनकी उष्मा से
चलती है
जिन्दगी की
नाव मन्थर गति से
और झेल लेती है
जिन्दगी के समंदर
में उठे तूफ़ानो को
या मन में
उमड़े भूचालों को
बहुत कोमल
बहुत खूबसूरत होते हैं
ये संबन्ध
बचाये रखें इन्हे
शक की फ़फ़ूंदो से
जुबां के मिसाइलों से
अविश्वास की महामारी से











हर सप्ताह मेरी एक नई गज़ल व एक फ़ुटकर शे‘र हेतु आप यहां सादर आमंत्रित हैं
http://gazalkbahane.blogspot.com/
विश्वास रखें आप का समय व्यर्थ न जाएगा।

7 comments:

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  2. rishton ko bahut hi khoobsoorti se paribhashit kiya hai..........sach rishta wo hi hai jo dono ore se aur man se nibhaya jaye na ki bojh ho.

    pls read my blog also........

    http://ekprayas-vandana.blogspot.com
    http://vandana-zindagi.blogspot.com

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  3. रिश्ते और सन्देह पर सुन्दर विवेचना है, आपकी!
    बधाई!
    आपकी पुस्तकें मिल गई हैं।
    धन्यवाद!
    समय निकाल कर समीक्षा करूँगा।

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  4. आपकी यह विवेचना बहुत ही अच्छी लगी ......आप बहुत ही खुबसूरत लिखते हो ......आपकी रचनाये हमेशा से मुझे अच्छी लगती है ............आभार

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  5. बहुत सुन्दर विश्लेषण और खूबसूरत रचना

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  6. यही जादू है जो हर शख्स को पागल बनता है.... जर्रे को आफताब बनाने का फन आपके पास है. एक मामूली से विषय पर इतने मजबूत रचना आपकी ही लेखनी कर सकती है, बधाई.

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  7. shyam ji rishtey chahe daihik hon ya aatmik.hamesha aadmi ke wajood se chipke rahte hain aur kisi na kisi roop main taqleef hi dete hain.kaise? ye mere blog per dekh sakte hain.

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