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Wednesday, August 31, 2011

पीड़ा का राजकुअंर---गोपाल दास नीरज उर्फ़ जस की तस धर दीनी चदरिया


पीड़ा का राजकुअंर---गोपाल दास नीरज उर्फ़ जस की तस धर दीनी चदरिया
         नीरज नीं आया तां कुड़ियां वी नहीं आणीं,तू तरीख बदल दे। [नीरज जी नहीं आये तो लड़कियां कवि सम्मेलन में नहीं आएंगी, इसलिये तू कवि सम्मेलन की तारीख बदल दे] बात १९६३-१९६५ के बीच की है-स्थान वैश्य शिक्षण संस्थान रोहतक हरियाणा । मैं तब कल्चरल कल्ब का विद्यार्थी सचिव था
हमारे अध्यक्ष थे प्रोफ़ेसर अवस्थी और बोलने वाला था मेरा लंगोटिया दोस्त सुरेन्द्र सचदेवा जिस पर कालेज की अधिकांश लड़कियां मरती थीं। लड़कियों ने यह विरोध सुरेन्द्र के द्वारा मुझ तक पहुंचाया गया था। उन दिनों वैश्य कालेज में स्वस्थ कविसम्मेलनों की परम्परा रही थी जो तब तक चली जब तक फ़ूहड़ हास्य मं पर काबिज नहीं हुआ था।आखिर कवि सम्मेलन की तिथी बदली गई-ऐसा रहा है नीरज का रूतबा- वे सही मायनो में मंच व कविता के सुपर स्टार रहे है,है।
  उस कवि सम्मेलन के बाद मेरा दाखिला एडिकल कालेज में हो गया और वैश्य कालेज में भी कवि सम्मेलनों का काफिला खत्म हो गया। उस दिन नीरज जी को जो सुना वह आज तक हृद्‌य पर अंकित है। आप भी शामिल हो जाएं मेरी यादों की महफिल में
 अस्त-व्यस्त बालों,  अधखुle-अधमुंदे नयनो ,नीचे झूल आये निचले होंठ से जैसे ही नीरज का गीत- मैं पीड़ा का राजकुअंर हूं /तुम शहजादी रूपनगर की/हो गया प्यार अगर हो भी गया तो बोलो मिलन कहां पर होगा/  तो पंडाल में लड़कियों के प्रभाग मे ’कुआंरियां दा दिल मचले/आजा छत्त ते जिंद मेरिये [कुआंरियों का दिल मचलने लगा है इसलिये वे अपने प्रिय को कह रहीं हैं कि कम से कम अपने मकान कीछत पर ही आ जाओ जिससे उसके दर्शन कर ह्रद्‌य मे कुछ शीतलता पड़े} माहौल तारी हो
गया था।
 नीरज सचमुच पीड़ा के राजकुअंर है, विरह के शहंशाह हैं। नीरज ne पीड़ा को विरह को भगवान शि
की तरह ताउम्र कंठ में धारण किया हुआ है। वे सुकरात की तरह विष को पीकर मरे नहीं उन्होने पीड़ा के विष को अमर कर दिया। एक शायर का शे‘र 
दर्द तो जीने नहीं देता मुझे/और मैं मरने नहीं देता उसे 
उनकी फिलास्फ़ी को उजागर करता है।
उन दिनो, चांदनी की चादर सी,जुगनुओं जैसे शब्दों से बुनी,शहद और महुए की शराब रसवन्ती सी      उनकी कुछ रचनाये मन- मस्तिक पर आज भी अंकित हैं। ए रचनायें न केवल महकाती हैं अपितु बहकने को मजबूर कर देतीं हैं।
  उनका गीत

  मां मत हो नाराज कि मैने खुद ही मैली की न चुनरिया

  मैं तो हूं पिन्जरे की मैना क्या जानूं गलियां गलियारे

 तू ही बोली जाऊं देखूं मेला नदी किनारे/

मेलों से अनुराग हुआ जब/ माटी से संबन्ध हुआ तब/

बिल्कुल बेदाग कैसे रह पाये चुनरिया/

जो कुछ हुआ उसे भुला दे /संटी छोड़ बाल सहला दे

तेरी भी ममता न मिली तो जाने क्या कर बैठे गुजरिया
किशोर मन के भीतर से उठती माटी की सौंधी सी,अलबेली गंध क्या भूली जा सकती है?
सपना क्या है नयन सेज पर सोया हुआ आंख का पानी

और टूटना उसका जैसे जागे कच्ची नींद जवानी

गीली उम्र बनाने वालो/डूबे बिना नहाने वालो

केवल कुछ पानी के बह जाने से सावन नहीं मरा करता है
या
केवल कुछ मुखड़ों की नाराजी से दर्पण नहीं मरा करता है।
कलेजा चीरने वाली चीख के साथ-साथ जीने की अदभुत उद्य्याम ललक एक साथ कहां मिलेगी भला?
लो फिर अपत्र हुई डाल अमलतास की।कुछ और बढ़ी अवधि इस अभुझ प्यास की
और उसके बाद
उनका एक और अमर गीत
 सपन झरे फ़ूल से…..
कारवां गुजर गया… गुबार देखते रहे
 मानो पीड़ा का विरह का ज्वाला मुखी फ़ट गया था। पीड़ा को इतनी गरिमा महादेवी के बाद कोई दे पाया है तो हिन्दी में नीरज और पंजाबी में शिव बटालवी ही है

ये पंक्तियां मेरे किशोर मन पर तब से अंकित हैं और मैने इन्हे जस की तस धर दीनी चदरिया की तरह आप तक परोसा है।

हर सप्ताह मेरी एक नई गज़ल व एक फ़ुटकर शे‘र हेतु http://gazalkbahane.blogspot.com/

3 comments:

  1. यह आलेख बहुत महत्वपूर्ण है....इस महत्वपूर्ण प्रस्तुति के लिए आपको हार्दिक बधाई।

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  2. शराव पी पी कर लिखने और गाने वाले शराबी-कबाबी की कथा क्या लिखना...

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